मीरा चरित्र भाग-2 और कैकेयी-मंथरा संवाद का हुआ भावपूर्ण मंचन


बक्सर पब्लिक न्यूज:- बक्सर में श्री रामलीला समिति, बक्सर के तत्वावधान में ऐतिहासिक किला मैदान स्थित विशाल रामलीला मंच पर आयोजित 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के अंतर्गत दिन में श्रीकृष्ण लीला के दौरान मीरा चरित्र भाग-2 तथा देर रात्रि मंचित रामलीला में कैकेयी-मंथरा संवाद एवं कैकेयी अंतर्द्वंद्व प्रसंगों का मंचन किया गया। श्रीधाम वृंदावन से पधारे श्री बालकृष्ण रासलीला एवं रामलीला मंडल के स्वामी श्री मोहन श्याम भारद्वाज जी के सफल निर्देशन में कलाकारों द्वारा दोनों प्रसंगों को जीवंत रूप दिया गया।
दिन में मंचित मीरा चरित्र भाग-2 में मीराबाई की भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति, प्रेम और समर्पण को दर्शाया गया।जिसमें दिखाया गया कि मीरा सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर अपने आराध्य गिरधर गोपाल को ही अपना सर्वस्व मानती हैं। पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों के बीच भी उनकी कृष्ण भक्ति अडिग रहती है। भजन और भावपूर्ण अभिनय के माध्यम से कलाकारों ने मीरा की भक्ति भावना को मंच पर साकार किया।इस प्रसंग में ईश्वर के प्रति विश्वास, निष्ठा और समर्पण का संदेश उभरकर सामने आया।
वहीं देर रात्रि मंचित रामलीला में अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों के बीच मंथरा द्वारा कैकेयी को समझाने और उनके मन में आशंका उत्पन्न करने का प्रसंग दिखाया गया।जिसमें दिखाया गया कि मंथरा कैकेयी को उनके द्वारा पूर्व में प्राप्त दो वरदानों की याद दिलाती है और भरत के लिए राजगद्दी मांगने का सुझाव देती है।मंथरा की बातों से प्रभावित होकर कैकेयी कोपभवन में चली जाती हैं। महाराज दशरथ के मनाने पर वह अपने दो वरदान मांगती हैं। पहले वरदान में भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और दूसरे में श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगती हैं। कैकेयी की मांग सुनकर महाराज दशरथ गहरे दुख में पड़ जाते हैं। एक ओर श्रीराम के प्रति उनका स्नेह और दूसरी ओर दिए गए वचन की मर्यादा उन्हें असमंजस में डाल देती है।
इस प्रसंग में कैकेयी के मन में उत्पन्न परिवर्तन, मंथरा की भूमिका और महाराज दशरथ की पीड़ा को कलाकारों ने भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। यह घटनाक्रम रामकथा में श्रीराम के वनगमन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।दोनों लीलाओं के माध्यम से जहां मीरा की कृष्ण भक्ति और समर्पण का चित्रण हुआ, वहीं रामलीला के प्रसंग ने पारिवारिक संबंधों, वचन की मर्यादा और निर्णयों के दूरगामी परिणामों को सामने रखा।



