22 अक्टूबर 1764: कतकौली के मैदान में तीन घंटे में बदली थी देश की तकदीर,बक्सर युद्ध से पड़ी थी अंग्रेजी हुकूमत की असली नींव

बक्सर पब्लिक न्यूज:- भारतीय इतिहास के पन्ने में 22 अक्टूबर 1764 का दिन हमेशा के लिए अविस्मरणीय हो गया। यह वही दिन था जब बक्सर के कतकौली के मैदान में एक ऐसा युद्ध लड़ा गया, जिसने महज तीन घंटे के भीतर देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।इतिहास में इस लड़ाई को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी यह हकदार थी। इस युद्ध में एक तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी, जिसका कुशल नेतृत्व कैप्टन सर हेक्टर मुनरो कर रहा था। वहीं दूसरी तरफ बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना आमने-सामने थी।
इतिहासकारों के अनुसार, अंग्रेजों की कूटनीति और कुछ सहयोगियों की गद्दारी के चलते संयुक्त सेना को हार का सामना करना पड़ा। मात्र तीन घंटे चले इस संघर्ष में कंपनी ने बाजी अपने नाम कर ली। युद्ध के तुरंत बाद मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेजों से संधि कर ली, जबकि मीर कासिम रणभूमि से भाग निकला और 1777 में दिल्ली के पास अज्ञात अवस्था में उसकी मौत हो गई।इतिहासकार मानते हैं कि प्लासी के मुकाबले बक्सर का युद्ध भारत में अंग्रेजी प्रभुता की वास्तविक जन्मभूमि है। इस हार के बाद मुगल सम्राट और नवाब पूरी तरह से कठपुतली शासक बनकर रह गए। उत्तर भारत में ब्रिटिश राज की नींव मजबूत हो गई और भारतीयों की हथेलियों पर मानो दासता की इबारत लिख दी गई, जो 1947 की आजादी के बाद ही मिट सकी।
कतकौली मैदान में आज भी उस ऐतिहासिक संघर्ष के निशान सुरक्षित हैं। यहाँ एक ‘विशाल कुआँ’ मौजूद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि युद्ध में मारे गए सैनिकों के शवों और हथियारों को अंग्रेजों ने इसी में फेंक दिया था ताकि कोई दोबारा उनका इस्तेमाल न कर सके। युद्ध के बाद अंग्रेजों द्वारा बनाए गए विजय स्तूप को बाद में वीर कुंवर सिंह के भाई द्वारा गिरवा दिया गया था। वर्तमान में वहाँ अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में अंग्रेजों की जीत का संदेश लिखे तीन पत्थर और प्रशासन द्वारा बनवाया गया एक छोटा विजय स्तूप आज भी उस दौर की दास्ताँ बयां करते हैं।



