विभीषण शरणागति, सेतुबंध-रामेश्वरम पूजा एवं रावण-अंगद संवाद” के साथ “अक्रूर आगमन” प्रसंग का हुआ भव्य मंचन


बक्सर पब्लिक न्यूज:- श्री रामलीला समिति, बक्सर के तत्वावधान में नगर के ऐतिहासिक किला मैदान स्थित विशाल रामलीला मंच पर आयोजित 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के पंद्रहवें दिन रविवार को देर रात्रि मंचित रामलीला में विभीषण शरणागति, सेतुबंध, रामेश्वरम पूजा एवं रावण-अंगद संवाद की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। वहीं दिन में आयोजित कृष्णलीला में अक्रूर आगमन के प्रसंग ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
श्रीधाम वृंदावन से पधारी सुप्रसिद्ध श्री बाल कृष्ण रासलीला एवं रामलीला मंडल के कलाकारों ने स्वामी श्री मोहन श्याम भारद्वाज के निर्देशन में दोनों लीलाओं का प्रभावशाली मंचन किया।
रामलीला में विभीषण शरणागति से सेतुबंध तक का प्रसंग
देर रात्रि मंचित रामलीला में दिखाया गया कि जब रावण माता सीता को प्रभु श्रीराम के पास सम्मानपूर्वक लौटा देने की विभीषण की सलाह को अनसुना कर देता है, तब क्रोध में आकर उसे अपने दरबार से अपमानित कर निष्कासित कर देता है। इसके बाद विभीषण अपने भाई का साथ छोड़कर प्रभु श्रीराम की शरण में पहुंचते हैं। श्रीराम उनकी शरणागति स्वीकार करते हुए उन्हें हृदय से लगाते हैं और लंका का राज्य प्रदान करने का वचन देते हैं।
इसके पश्चात समुद्र पार कर लंका पहुंचने की तैयारी शुरू होती है। प्रभु श्रीराम समुद्र देव की आराधना कर मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं। समुद्र द्वारा मार्ग न मिलने पर श्रीराम क्रोधित होकर अग्निबाण उठाते हैं। तभी समुद्र देव प्रकट होकर क्षमा मांगते हैं और नल-नील के सहयोग से समुद्र पर सेतु निर्माण का उपाय बताते हैं। श्रीराम की सेना वानरों के सहयोग से सेतु निर्माण में जुट जाती है और अंततः समुद्र पर सेतु तैयार हो जाता है।लंका की ओर प्रस्थान करने से पूर्व प्रभु श्रीराम रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद वे अपनी सेना के साथ समुद्र पार कर लंका पहुंचते हैं।
रावण-अंगद संवाद में दिखा अहंकार और धर्म का संघर्ष
लंका पहुंचने के बाद प्रभु श्रीराम युद्ध से पहले एक बार फिर शांति और संधि का अवसर देते हुए राजा बालि के पुत्र अंगद को दूत बनाकर रावण के दरबार में भेजते हैं। अंगद रावण को माता सीता को ससम्मान लौटाकर प्रभु श्रीराम की शरण में आने की सलाह देते हैं, लेकिन अहंकार में डूबा रावण उनके प्रस्ताव को ठुकरा देता है। अंगद अपने पराक्रम और दृढ़ संकल्प से रावण के दरबार में श्रीराम की शक्ति का परिचय देते हैं और अंततः रामदल में लौटकर पूरी घटना से प्रभु श्रीराम को अवगत कराते हैं।
इन प्रसंगों के माध्यम से कलाकारों ने शरणागत की रक्षा, धर्म की मर्यादा, शांति के प्रयास और अहंकार के दुष्परिणामों का प्रभावशाली संदेश दिया। मंचन के दौरान पंडाल जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठा।
कृष्णलीला में अक्रूर आगमन का भावपूर्ण मंचन
वहीं दिन में मंचित कृष्णलीला में अक्रूर आगमन का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। इसमें दिखाया गया कि मथुरा का राजा कंस भगवान श्रीकृष्ण और बलराम को समाप्त करने की योजना बनाकर धनुष यज्ञ के आयोजन के बहाने दोनों भाइयों को मथुरा बुलाने का षड्यंत्र रचता है। इसके लिए वह अपने संबंधी अक्रूर जी को गोकुल भेजता है।
अक्रूर जी रथ लेकर गोकुल पहुंचते हैं और श्रीकृष्ण-बलराम को मथुरा ले जाने का संदेश देते हैं। जब श्रीकृष्ण के मथुरा जाने की बात नंद बाबा और माता यशोदा सहित समस्त ब्रजवासियों को पता चलती है, तो पूरा ब्रजमंडल विरह की आशंका से व्याकुल हो उठता है। माता यशोदा और ब्रजवासी उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, लेकिन कंस के अत्याचारों का अंत करने और अपने कर्तव्य की पूर्ति के लिए श्रीकृष्ण मथुरा जाने का निर्णय लेते हैं।
अक्रूर जी के साथ श्रीकृष्ण और बलराम के प्रस्थान का दृश्य अत्यंत भावुक रहा। ब्रजवासियों का प्रेम, माता यशोदा की ममता और भगवान श्रीकृष्ण के कर्तव्यबोध को कलाकारों ने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रसंग ने दर्शकों को भक्ति, प्रेम और विरह की अनुभूति से भर दिया तथा पूरा पंडाल जय श्रीकृष्ण के उद्घोष से गूंज उठा।
लीला मंचन के दौरान आयोजन समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक उपस्थित रहे।



