दशरथ मरण,भरत मनावन और सुदामा चरित्र भाग 2 का भावपूर्ण मंचन”


बक्सर पब्लिक न्यूज:- श्री रामलीला समिति बक्सर के तत्वावधान में चल रहे 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के दशवें दिन मंगलवार को रामलीला मंच पर देर रात तक दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ी रही।श्रद्धालुजन पूरी तन्मयता से लीला का आनंद लेते रहे और मंचित प्रसंगों के दौरान “जय श्रीराम” तथा “जय श्रीकृष्ण” के उद्घोष से पूरा पंडाल गुंजायमान हो उठा।
मंगलवार की देर रात मंचन की शुरुआत “दशरथ मरण” प्रसंग से हुई। कथा के अनुसार मंत्री सुमंत प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को गंगा तट पर छोड़कर अयोध्या लौटते हैं। व्याकुल सुमंत जब महाराज दशरथ को समस्त वृत्तांत सुनाते हैं तो राम-वियोग से व्यथित महाराज दशरथ का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है और वे विलाप करते-करते देह त्याग देते हैं।यह दृश्य इतना हृदयस्पर्शी था कि दर्शकों की आँखें नम हो गईं। मंच पर कलाकारों की संवाद शैली और अभिनय ने मानो वास्तविक दृश्य को साकार कर दिया।
इसके बाद चित्रकूट में भरत मिलाप का प्रसंग मंचित हुआ।
जिसमें दिखाया कि-
पिता के निधन का समाचार पाकर भरत अपने ननिहाल से अयोध्या लौटते हैं, अंतिम संस्कार संपन्न कर श्रीराम को अयोध्या लौटने की प्रार्थना करने चित्रकूट पहुंचते हैं।
इस दौरान दिखाया गया कि संध्या 4.00 बजे किला मैदान स्थित रामलीला मंच से भरत जी रथ पर सवार होकर चित्रकूट जाने के लिए निकलते हैं और नगर भ्रमण करते हुए स्टेशन रोड स्थित कमलदह पहुंचते हैं वहां कुछ प्रसंगों के पश्चात् सीधे रामलीला मंच आते हैं और वहां आगे के प्रसंगों का विधिवत मंचन होता है।
जिसमें दिखाया गया कि चित्रकूट जाते समय मार्ग में निषादराज से उनकी भेंट होती है और अंततः वे प्रभु श्रीराम से मिलते हैं। वहां भरत जी बार-बार अयोध्या लौटने की विनती करते हैं, परंतु राम पिता के वचनों को निभाने की बात कहकर इंकार कर देते हैं। वे भरत को अपनी चरण पादुका सौंप देते हैं। भरत अयोध्या लौट जाते हैं।और श्रीराम के चरण पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित कर देते हैं। इस प्रसंग ने उपस्थित दर्शकों को गहन भक्ति और भावनाओं से सराबोर कर दिया।
इसी क्रम में दिन में श्री बाल कृष्ण रासलीला रामलीला मंडल के स्वामी श्री मोहन श्याम भारद्वाज जी सफल निर्देशन में वृंदावन के कलाकारों ने कृष्णलीला के अंतर्गत सुदामा चरित्र भाग-2 का मंचन किया।जिसमें दर्शाया गया कि गरीबी से जूझ रहे सुदामा अपनी पत्नी वसुंधरा के आग्रह पर अपने बचपन के मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका जाते हैं। सुदामा द्वारा भेंट में लाए गए मुट्ठीभर चावल को प्रभु श्रीकृष्ण प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करते हैं और उसके बदले सुदामा को अपार संपत्ति प्रदान करते हैं। इस अद्भुत मित्रता और भगवान की कृपा को देख दर्शक “जय श्रीकृष्ण” का जयघोष करने लगे।
रामलीला और कृष्णलीला दोनों ही मंचनों के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग सभी बड़ी श्रद्धा और रुचि से लीला का आनंद ले रहे थे। मंचन के समय दर्शकों की भीड़ इतनी अधिक थी कि पंडाल के बाहर तक लोग खड़े होकर प्रसंगों का रसपान करते रहे।भावपूर्ण प्रसंगों का संचालन वृंदावन से आए मंडल स्वामी श्री मोहन श्याम भारद्वाज जी के सफल निर्देशन में हुआ।आयोजन के दौरान समिति के सचिव बैकुंठनाथ शर्मा,
कोषाध्यक्ष सुरेश संगम, सुशील मानसिंहका, राजेश चौरसिया, ब्रजमोहन सेठ, पवन चौरसिया, उदय सर्राफ जोखन सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।



